न्याय की पट्टी या पूर्वाग्रह का झांसा? जस्टिस कौल का संस्मरण और निष्पक्ष चेतना का संवैधानिक संकट
संवैधानिक स्तंभों की निष्पक्षता: जब न्याय की देवी की आँख की पट्टी सत्ता के प्रभाव पर सवाल उठाने लगे हाल ही में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज, जस्टिस संजय किशन कौल के आने वाले संस्मरण (Memoir) के कुछ अंशों ने भारतीय न्यायपालिका और राजनैतिक गलियारों में एक अभूतपूर्व बहस छेड़ दी है। इस संस्मरण में यह गंभीर दावा किया गया है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी. वाई. चंद्रचूड़ कुछ महत्वपूर्ण न्यायिक नियुक्तियों (Judicial Appointments) को लेकर सरकार के प्रति "अत्यधिक संवेदनशील या झुकाव" (too deferential to the Government) रखते थे। इस खुलासे के बाद मुख्यधारा की मीडिया में पक्ष और विपक्ष के बीच तीखे बयानों का दौर शुरू हो गया है। 'The Sovereign Vāk' के इस मंच पर आज हम 'सत्यम शिवम् सुंदरम' के हमारे मूल सिद्धांतों के अनुरूप इस विषय पर कोई राजनैतिक पक्षपात या सतही आरोप-प्रत्यारोप की चर्चा नहीं करेंगे। हम इस विवाद की तह में जाकर "न्याय के दर्शन" (Philosophy of Absolute Justice) और "मानव मस्तिष्क के संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह" (Cognitive Bias of the System) का एक...